नोबेल की लालसा और युद्ध का मैदान : वैश्विक कूटनीति या बचपन की ज़िद ?

 


 आपको याद होगा  बचपन का वो दृश्य, जब कोई खिलाड़ी को चांस न  मिलने पर नाराज होकर अपनी गेंद समेट लेता था या विकेट उखाड़कर घर भाग जाता था लेकिन यह  बच्चों के अपरिपक्व  व्यवहार की सामान्य  घटना होती थी, लेकिन आज दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश के नेतृत्व में वही 'बचपन की ज़िद' दिखाई दे रही है। जो राष्ट्रपति कुछ समय पहले 'ग्लोबल टैरिफ' के जरिए शांति और युद्ध समाप्ति की बात कर रहे थे, क्या अचानक नोबेल शांति पुरस्कार की दौड़ से बाहर होते ही उन्होंने पश्चिम एशिया को युद्ध की आग में झोंक दिया है।

    ईरान के साथ जो बातचीत वर्षों से कूटनीतिक मेज पर चल रही थी, वह रातों-रात एक भीषण संघर्ष में कैसे बदल गई ? यह सवाल पूरी दुनिया को झकझोर रहा है। आम आदमी की यह बात समझ से परे है यह कैसा मानसिकता का विरोधाभास है  क्या यह केवल सत्ता का अहंकार है या नोबेल जैसे सम्मान न मिलने की हताशा?  जो नेतृत्व आर्थिक प्रतिबंधों ग्लोबल टैरिफ को युद्ध रोकने का हथियार बता रहा था, उसने अचानक मिसाइलों का रास्ता कैसे चुन लिया। इस बदलाव ने वैश्विक विश्वास को गहरी चोट पहुँचाई है। युद्ध का सबसे वीभत्स पहलु  उन निर्दोष लोगो की मौत तो है ही, लेकिन इस युद्ध का सबसे  अधिक आर्थिक प्रभाव आने वाले कुछ समय में सबसे अधिक दक्षिण एशिया के देशो पर ही पड़ने  वाला है । भारत के ईरान के साथ सबंध  इतिहास में उतार-चढ़ाव वाले रहे है लेकिन आज भारत के ईरान के साथ सबंध चाबहार बंदरगाह और मध्य एशिया तक पहुंच जैसे ठोस हितों पर टिका हुआ है। यदि हम सकल घरेलू उत्पाद (जी. डी. पी ) जैसे भारी भरकम तकनीक शब्दों में न जाकर यदि आप नागरिक के नजरिए से देखे तो  पिछले कुछ वर्षों में रोजमर्रा की वस्तुओं के दाम 30 -40% तक बढ़े थे जिसमे  हाल ही में जो 4 से 5% की मामूली राहत मिलती दिखाई दी  थी, वह इस युद्ध की भेंट चढ़ जाएगी। जब तेल महंगा होगा, तो परिवहन से लेकर थाली तक सब महंगा हो जाएगा। आज के युग में युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं, बल्कि शोशल मिडिया प्लेटफार्म, स्क्रीन पर भी लड़ा जाता है।  ऐसी संभावना  भी है कि आने वाले कुछ दिनों में मुख्यधारा का मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म इस युद्ध से होने वाले दुष्प्रभाव को जैसे की ख़राब जंक फ़ूड में अजीनो मोटो नामक प्रदार्थ डालकर स्वादिष्ट बनाने की कोशिश करते हुए दिखाई देंगे युद्ध कभी भी समस्या का समाधान नहीं होता। एक तरफ मासूमों की जान जा रही है और दूसरी तरफ दुनिया की अर्थव्यवस्था खस्ताहाल होने की कगार पर है। कूटनीति की मेज को छोड़कर रणभूमि का चुनाव करना उस 'आइडियल बच्चे' जैसा ही है जो खेल हारने पर गेंद छुपा देता है, फर्क सिर्फ इतना है कि यहाँ गेंद की जगह इंसानियत दांव पर लगी है। डिजटल  प्लेटफॉर्म सोशल मीडिया पर ऐसे कंटेंट  सक्रिय हो चुके है जो इस युद्ध के दुष्प्रभावों को ढकने की कोशिश करेंगे, जो इस  युद्ध की तबाही को भी 'रणनीतिक जीत' या 'सकारात्मक बदलाव' के रूप में पेश करेंगे। आम आदमी को यह समझाने की कोशिश की जाएगी कि महंगाई या तबाही राष्ट्रहित में है। 

  यदि युद्ध लंबा खिंचता है,खाड़ी  में निर्माण, पर्यटन और लॉजिस्टिक्स जैसे क्षेत्र सबसे पहले प्रभावित होंगे, जहाँ कार्य करने वाले भारतीयों की संख्या सबसे अधिक है। अकेले सयुक्त अरब अमीरात में कार्य करने वाले भारतीयों की संख्या लगभग 39 लाख है, जो की वहां की कुल आबादी का 35 से 38 प्रतिशत है इस युद्ध के कारण खाड़ी देशो में कार्य करने वाले लगभग एक करोड़ भारतीयों की सुरक्षा और अर्थव्यवस्था पर बड़ा खतरा मंडराने लग गया है । 

       पिछले चार वर्षो से  रूस व यूक्रेन  के बीच चल रहे  युद्ध से अभी तक  समाधान नहीं निकलता दिख रहा है, लेकिन इस युद्ध की वीभत्स तस्वीर यह है कि   दोनों ही देशो के हजारो नागरिक व सैनिक इस युद्ध में अपनी जान गंवा चुके है, आज सभी देशो के राजनियकों को समझना होगा युद्ध  कभी भी समस्या का समाधान नहीं होता। एक तरफ मासूमों की जान जा रही है और दूसरी तरफ दुनिया की अर्थव्यवस्था खस्ताहाल होने की कगार पर है। कूटनीति की मेज को छोड़कर रणभूमि का चुनाव करना उस 'आइडियल बच्चे' जैसा ही है जो खेल हारने पर गेंद छुपा देता है, फर्क सिर्फ इतना है कि यहाँ गेंद की जगह इंसानियत दांव पर लगी है।

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