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युजीसी रॆगुलॆशन का शॊर जीरॊ परसेंटाइल वाले पीजी डॉक्टर !



 
विशेष रिपोर्ट: यूजीसी  के समता रेगुलेशन के शोर में नीट पीजी की कट ऑफ जीरो और कुछ मामलों कुछ मामलों में माइनस अंको तक निर्धारित करने जैसा गंभीर विषय गौण  हो गया है  देश के मेडिकल कॉलेजो में हजारों सीटें खाली रहने को आधार बनाते हुए राष्ट्रीय चिकित्सा विज्ञान बोर्ड ने नीट पीजी 2025 के परसेंटाइल में इतना चमत्कारिक बदलाव किया कि ऐसे युवा भी अब मेड़िकल की पीजी डिग्री करने के पात्र हो गए , जिन्होंने अर्हकारी परीक्षा में शून्य प्रतिशत अथवा इससे भी कम अंक प्राप्त किये है ।
      मीडिया में जिस तेजी से जीरो परसेंटाइल का मामला सामने आया है उसे लग रहा है कि सरकार के स्तर पर कोई ऐसा निर्णय जरूर लिया जाएगा, जिससे देश में यह  मैसेज न जाए  कि  अयोग्य डॉक्टरों को भी पीजी डिग्री में प्रवेश दे दिया गया लेकिन इसी बीच यूजीसी के इक्वल्टी रेगुलेशन, जिसके द्वारा कॉलेजों और विश्विद्यालयों में समता संवर्धन केंद्र स्थापित किये जाने थे, यूजीसी के तीखे विरोध से उपजे शोर शराबे में शून्य अथवा माईनस परसेंटाइल के आधार पर मेडिकल डिग्री में प्रवेश की बात कहीं नेपथ्य में चली गयी है । 
       इसके साथ ही यह सवाल भी निरर्थक हो गया की एक एमबीबीएस पास व्यक्ति पीजी डिग्री के एंट्रेंस एग्जाम में बैठ रहा हैं, तो वह कौन से कारण रहे होंगे की उसका पास होना तो दूर, उसकी शून्य अंको वाली सफलता भी उल्लेक्खनीय हो गयी और इसी शून्य के आधार पर भी एडमिशन ऑफर किया जा रहा है । 
     इस विषय पर विचार करने से पहले दो पहलुओं पर ध्यान दिए जाने की आवश्यकता  है। पहला पहलू  यह कि परसेंटाइल से अंक-प्रतिशत अथवा मेरिट के स्थान का निर्धारण नहीं होता। परसेंटाइल सिस्टम कई स्तरों पर भ्रम की स्थिति पैदा करता है । परसेंटाइल व्यवस्था में यह भी संभव है कि कोई व्यक्ति साठ परसेंटाइल के बावजूद प्रतिशत की दृष्टि से पच्चीस प्रतिशत ही अंक प्राप्त कर सका हो, परसेंटाइल सिर्फ यह बताता है कि जितने लोगों ने परीक्षा दी है, संबंधित व्यक्ति उस परीक्षा में कितने लोगो से आगे हैं । यदि किसी बैच में कुल प्रदर्शन ही खराब हो, तो उच्च परसेंटाइल वाले व्यक्ति के वास्तविक अंक भी खराब हो सकते हैं ।
       दूसरा पहलू यह है कि नीट  पीजी 2025 में एडमिशन कट ऑफ़  का शून्य परसेंटाइल तक गिरना कोई अचानक हुई घटना है या उसके पीछे कोई और बड़ी वजह है । जैसा कि मीडिया में बताया गया है कि आरक्षित वर्गों को लाभ पहुंचाने के लिए यह निर्णय लिया गया है इसके पीछे एक बात यह रही है कि देश के संसाधन खराब ना जाए , उनका उपयोग आरक्षित वर्ग के लोगों को बेहतर शिक्षा देने में किया जाए। इस बात को मुख्य धारा के मीडिया ने जोर-शोर से परोसा है  लेकिन  सच्चाई इतनी सरल नहीं है। 
      पीजी मेडिकल कॉलेज की सीटों को दो हिस्सों में बैठकर देखा जा सकता है पहला हिस्सा सरकारी कॉलेजों  का है, जहां हमेशा ही एडमिशन को लेकर मारमारी  रहती है। इन कॉलेज में आरक्षित वर्ग के स्टूडेंट को भी ऊंची मेरिट होने पर ही प्रवेश मिल सकता है इससे यह बात स्पष्ट है कि नीट  पीजी का परसेंटाइल जीरो किये  जाने से सरकारी कॉलेज में प्रवेश की कोई संभावना नहीं बनती। दूसरे कॉलेज है जिन प्राइवेट सेक्टर चलता है और इनमें फीस इतनी अधिक है कोई भी सामान्य व्यक्ति अपने बच्चों को एडमिशन दिलाने के बारे में नहीं सो सकता । यहां की सामान्य व्यक्ति की बात हो रही है इस श्रेणी में ग्रुप ए  ही नौकरी करने वाला सरकारी अधिकारी भी शामिल है।  यदि वह अपने जीवन की सारी जमा पूंजी जोड़ ले तो शायद ही अपने एक बच्चे को मेडिकल की पीजी डिग्री करा सके अब इस बात का पुनः  स्मरण कीजिए कि जीरो  परसेंटाइल पर इन प्राइवेट मेडिकल कॉलेज में किन लोगों को एडमिशन मिलेगा।  यह बात आपको शॉक  जैसी लगेगी लेकिन  सच्चाई  यही है कि जिन युवाओं ने प्राइवेट कॉलेज में जैसे-तैसे एमबीबीएस पास किया है अब ज्यादातर वही युवा इन प्राइवेट कॉलेज में पीजी मेडिकल डिग्री में प्रवेश प्राप्त करेंगे।  इन युवाओं में सबसे बड़ी योग्यता यह है कि वह ऐसे परिवारों से आते  है जहां सालाना बीस से तीस लाख रुपए या इससे भी अधिक फ़ीस चुकाने की आर्थिक क्षमता मौजूद है । 
        आरक्षित वर्ग में ऐसे  कितने लोग होंगे जो इतनी बड़ी फीस चुकाकर प्राइवेट कॉलेज में एडमिशन लेने के लिए कतार में खड़े होंगे ? अनुमान यही है कि यह संख्या नाम मात्र की होगी, पीजी मेडिकल डिग्री में जीरो  परसेंटाइल पर एडमिशन के मामले में नए सिरे से यह साबित किया है यदि आप आर्थिक रूप से संपन्न है और आपके पास पूंजी का बड़ा संबल  है तो फिर विशिष्ट योग्यता बहुत मायने नहीं रखती । इसमें कोई संदेह नहीं है कि भारत में मेडिकल एजुकेशन एक ऐसे ठिकाने पर पहुंच गई है, जहां केवल दो प्रकार के युवा ही डॉक्टर बन सकते हैं पहले हुए हैं जिन्हें उच्च स्तर की मेधा प्राप्त है (जिनकी संख्या बहुत ज्यादा नहीं है ) और दूसरी श्रेणी उन लोगों की है जो प्राइवेट कॉलेज में किसी भी स्तर की फीस चुकाकर एमबीबीएस और उसके बाद पीजी मेडिकल डिग्री हासिल कर सकते हैं उनके बीच में लोअर और लोअर मिडल क्लास के युवाओं के लिए एमबीबीएस और उसके बाद पीजी मेडिकल डिग्री एक असंभव सपने जैसी बन गई है।
     नीट पीजी मे जीरो और माईनस परसेंटाइल के बाद मीडिया में कुछ ऐसे समाचार और विज्ञापन भी देखने को मिले हैं, जिनमें  इंडियन मेडिकल एसोसिएशन अर्थात आईएमए के पदाधिकारी द्वारा इस निर्णय का स्वागत किया गया है यह चिंता जनक संकेत है क्योंकि जिस आईएमए  को चिकित्सा जैसे पैसे में उच्च पेशेवर मूल्य की रक्षा और मेधा संपन्न युवाओं को आगे आने के लिए प्रोत्साहित करना है वहीं उन लोगों के साथ खड़ी देखने लगी है, जो जीरो परसेंटाइल के समर्थक है। हालांकि मेडिकल एजुकेशन के नियमन, प्रवेश प्रक्रिया के संचालन अथवा फीस आदि के निर्धारण में आईएमए की कोई सीधी भूमिका नहीं है लेकिन यह एक ऐसा शक्तिशाली समूह जरूर है, जो मेडिकल एजुकेशन की नीतियों को व्यापक स्तर पर प्रभावित करने की क्षमता रखता है। आईएमए में ऐसे लोग शामिल हैं, जो प्राइवेट मेडिकल कॉलेज चलाते हैं और वह इतनी क्षमता रखते हैं कि मेडिकल की रेगुलेटरी बॉडी नेशनल मेडिकल काउंसिल के जरिए अपना एजेंडा लागू करवा सकते हैं ।  बार-बार यह कहा जा रहा है कि भारत में डॉक्टरों की कमी है, इसलिए किसी भी स्तर पर मेडिकल की सीटे  खाली नहीं  रखी जानी चाहिए, चाहे उन सीटों पर अयोग्य लोगों को ही एडमिशन देना पड़े।  जबकि भारत में अब विश्व स्वास्थ संघटन के मानकों   से अधिक संख्या में डॉक्टर उपलब्ध हो चुके हैं, विगत वर्षों में सरकारी मेडिकल कॉलेज की संख्या भी लगातार बड़ी है।  हालांकि नए मेडिकल कॉलेज की एजुकेशन गुणवत्ता अभी वैसी नहीं है, जैसी पुरानी मेडिकल कॉलेज में हो रही है फिर भी सरकारी कॉलेज के मामले में एक बात पर संतोष किया जा सकता है कि एक तो यहां फीस तुलनात्मक रूप से कम है और दूसरे मेडिकल कॉलेज के साथ जुड़े अस्पतालों में मरीजों की भीड़ बहुत होती है इसलिए भावी  डॉक्टरों  को अच्छी ट्रेनिंग मिलने की संभावना रहती है। 
       क्या उपयुक्त बातों को सभी प्राइवेट मेडिकल कॉलेज पर भी लागू किया जा सकता है, इस सवाल का बहुत स्पष्ट उत्तर वे लोग दे सकते हैं जो मेडिकल एजुकेशन के  स्याह पहलुओं को जानते हैं, कुछ अपवाद हो सकते हैं लेकिन बहुसंख्या  संख्या ऐसे प्राइवेट संस्थानों की है जिनकी एजुकेशन गुणवत्ता बहुत संतोषजनक नहीं है । यदि मेडिकल एजुकेशन को उनके मूल उद्देश्य के अनुरूप  बनाए रखना है तो प्राइवेट मेडिकल कॉलेज में फीस के निर्धारण पर कड़े मानक लागू किए जाने की आवश्यकता है ।  इन कॉलेज के मामले में यह तर्क गया जाता है कि कॉलेज चलाने वालों ने बहुत मोटा पैसा निवेश किया है इसलिए सीटों को खाली छोड़ना उचित नहीं होगा इसलिए बेहतर तरीका यह है कि खाली सीटों पर  सरकारी सीटों का कोटा बढ़ाया जाए और उन सीटों पर उन लोगों को एडमिशन दिया जाए जो ऊंची मेरिट वाले हैं लेकिन कड़ी प्रतिस्पर्धा के कारण सरकारी कॉलेज में एडमिशन नहीं पा सके हैं, इससे संसाधनों के सदुपयोग की बात पूरी हो जाएगी और  सुयोग्य  लोगों को मेडिकल जैसे महत्वपूर्ण पेशे में आने का अवसर मिलेगा। 
    इस क्रम में यह भी याद रखे जाने की आवश्यकता है कि सरकारी मेडिकल कॉलेजों में कम फीस से पढ़े डॉक्टरों से ही यह उम्मीद की जा सकती है कि वे डेढ़–दो लाख रुपए महीने के वेतन पर किसी सरकारी चिकित्सालय में सेवा देंगे। यह उम्मीद प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों के उन युवाओं से करना बेमानी होगी, जिन्होंने एक करोड़ रुपए की फीस खर्च करके एमबीबीएस और लगभग इतना ही खर्च करके पीजी मेडिकल डिग्री हासिल की है। इन दोनों डिग्रियों में दो करोड़ रुपए खर्च करने वाला व्यक्ति शायद ही डेढ़–दो लाख रुपए महीने की सरकारी नौकरी की तरफ देखेगा भी। जिस परिवार ने इतना बड़ा इन्वेस्टमेंट किया है, वह जल्द से जल्द इस इन्वेस्टमेंट का प्रतिफल भी हासिल करना चाहेगा। ऐसे में, मेडिकल पेशे की पवित्रता और डॉक्टर को भगवान जैसा मानने की अवधारणा औंधे मुंह पड़ी दिखाई देती है। 

डॉ. सुशील उपाध्याय


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