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विज्ञापनों वाली सफाई बनाम गुमनाम नायकों का पसीना आखिर कब तक कूड़े के ढेर बनेंगे हमारे जंगल

 विज्ञापनों वाली सफाई बनाम गुमनाम नायकों का पसीना आखिर कब तक कूड़े   के ढेर बनेंगे हमारे जंगल


ब्यूरो रिपोर्ट:अक्सर हम अपनी जिम्मेदारी का पल्ला झाड़कर सरकार से सवाल करते हैं कि सड़कों और गलियों में कूड़ा कौन साफ करेगा? हर बात के लिए व्यवस्था को दोष देना हमारी फितरत बन चुकी है, लेकिन क्या कभी हमने अपने गिरेबान में झाँक कर देखा है? विडंबना देखिए कि जिन जंगलों को हम धरती का फेफड़ा कहते हैं, आज हमने उन्हें भी अपनी गंदगी से नहीं बख्शा। इंसानी लालच और लापरवाही का आलम यह है कि अब पहाड़ों और जंगलों की हरियाली प्लास्टिक के कचरे के नीचे दम तोड़ रही है। समय-समय पर सरकार और स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा बड़े-बड़े सफाई अभियान चलाए जाते हैं। इनमें नामचीन हस्तियाँ और सेलिब्रिटी शामिल होते हैं, कैमरे चमकते हैं और सोशल मीडिया पर 'स्वच्छता' के नाम पर खूब वाहवाही लूटी जाती है। लेकिन हकीकत यह है कि सूरज ढलने और कैमरों के बंद होने के साथ ही ये अभियान भी दम तोड़ देते हैं। अगले दिन की सुबह वही कूड़ा फिर से हमारी व्यवस्था और नैतिकता का मखौल उड़ा रहा होता है। इस शोर-शराबे के बीच कुछ ऐसे निस्वार्थ चेहरे भी हैं, जिन्हें न कोई कैमरा जानता है और न ही कोई सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म। ये वो लोग हैं जो दिन-रात, बिना किसी प्रचार के, हमारे द्वारा फैलाए गए कचरे को साफ करने में जुटे हैं। जब हम छुट्टियों का आनंद लेकर जंगलों में गंदगी छोड़ आते हैं, तब ये साथी चुपचाप उस प्रदूषण से लड़ रहे होते हैं ताकि हमारी आने वाली पीढ़ियों को शुद्ध हवा मिल सके। ये वो 'स्वच्छता प्रहरी' हैं जो बिना किसी सेलिब्रिटी टैग के देश के प्रति अपना धर्म निभा रहे हैं। आज जरूरत है कि हम इन गुमनाम नायकों को पहचानें और उनका सम्मान करें। सवाल सिर्फ सरकार से पूछने का नहीं है, सवाल खुद से पूछने का भी है। क्या हम सिर्फ गंदगी फैलाने के लिए स्वतंत्र हैं? कूड़ा निस्तारण केवल सरकारी फाइलों का हिस्सा नहीं होना चाहिए, बल्कि इसे जन-आंदोलन बनना होगा। आइए, आज हम उन तमाम साथियों को सलाम करें जो बढ़ते प्रदूषण को कम करने के लिए अपना जीवन खपा रहे हैं। साथ ही, यह संकल्प लें कि हम अपने जंगलों और प्राकृतिक धरोहरों को बदसूरत नहीं होने देंगे। याद रखिए, कूड़ा फेंकने वाले हाथ से, कूड़ा उठाने वाले हाथ कहीं ज्यादा महान होते हैं।

(दीपेंद्र कंडारी )

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