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| प्रतीकात्मक तस्वीर |
देहरादून /ब्यूरो: देश की सीमाओं पर दुश्मन की गोलियों का सीना तानकर सामना करने वाला भारतीय सैनिक आज अपने ही देश के भीतर, अपने ही समाज और प्रशासन के हाथों हार रहा है। हाल के दिनों में पंजाब, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और उत्तराखंड से आई खबरें न केवल विचलित करने वाली हैं, बल्कि हमारी कानून व्यवस्था पर एक बदनुमा दाग भी हैं ये खबरे हर भारतीय का खून खौलाने के लिए काफी हैं। इसी क्रम में यहां पर कुछ घटनाक्रम का उल्लेख करना आवश्यक हो जाता है ।
'देवभूमि' कहे जाने वाले उत्तराखंड के ऋषिकेश और देहरादून में पूर्व सैनिकों और उनके परिवारों पर जानलेवा हमले, देहरादून में एक ताजा घटनाक्रम में अज्ञात विवाद को लेकर दिन दाहड़े, सरेआम शहीद कर्नल के बेटे की गोली मारकर हत्या, उत्तराखंड के मुख्यमंत्री की बेबसी को दर्शाता है, जो की स्वयं पूर्व सैनिक की संतान है। पिछले वर्ष में हुई घटनाओ में पंजाब में एक कर्नल और उनके बेटे को पुलिस द्वारा थाने में बेरहमी से पीटा जाता है। मध्य प्रदेश के महू में पिकनिक मनाने गए सैन्य अधिकारियों को बंधक बनाकर उनकी महिला मित्र के साथ सामूहिक दुष्कर्म जैसा घिनौना कृत्य किया जाता है। वहीं, उत्तर प्रदेश के सहारनपुर और प्रयागराज में छुट्टी पर आए सैनिकों की हत्या कर दी जाती है क्योंकि वे अपने परिवार या जमीन के विवाद को सुलझाने का प्रयास कर रहे थे।
आज के दौर में सड़क पर छोटी सी टक्कर भी जानलेवा हमले में बदल जाती है। पूर्व सैनिक, जो संयम का प्रतीक है, जब इन घटनाओं में हस्तक्षेप करता है या विरोध करता है, तो भीड़ और अपराधी तत्व उस पर हमला करने से नहीं चूकते। मेरठ और लखनऊ में हुई हाल की घटनाएं इसका प्रत्यक्ष प्रमाण हैं।
सैनिक के लिए "सिस्टम" का अर्थ है कि यदि कोई समस्या है, तो उसका समाधान नियमों के तहत होगा। लेकिन सिस्टम में बिना पैसे दिए छोटे काम भी नहीं होते। पुलिस अक्सर रसूखदार अपराधियों या नेताओं के दबाव में काम करती है। एक पूर्व सैनिक जब निडर होकर शिकायत करता है, तो उसे 'इगो' या 'अड़ियल' समझकर नजरअंदाज कर दिया जाता है।सैनिक व पूर्व सैनिक के अपराधियों का आसान शिकार बनने के पीछे मुख्य रूप से तीन मनोवैज्ञानिक और सामाजिक कारण हैं, सेना में उसके पीछे पूरी बटालियन होती थी, यहाँ वह भ्रष्ट तंत्र के खिलाफ अकेला खड़ा होता है। सैनिक सच बोलने से नहीं डरता, जो आज के चापलूस और अपराधी समाज में उसे 'टारगेट' बना देता है।
सितंबर 2025 में लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने मांग को लेकर के जुलूस और धरना प्रदर्शन के दौरान करगिल युद्ध के हीरो की पुलिस फायरिंग में जान गंवानी पड़ी थी, मई 2023 मणिपुर में जातीय हिंसा में दंगाई भीड़ के द्वारा रिटायर्ड फौजी की पत्नी के साथ शर्मनाक कृत्य यह मणिपुर हिंसा की सबसे भयावह तस्वीर थी। एक कारगिल युद्ध के पूर्व सैनिक की पत्नी को भीड़ ने निर्वस्त्र कर घुमाया और उनके साथ अभद्रता की । इस घटना के बाद उस पूर्व सैनिक का बयान रोंगटे खड़े करने वाला था: "मैंने कारगिल में देश की रक्षा की, श्रीलंका में शांति सेना का हिस्सा रहा, लेकिन अपने ही देश में, अपने ही घर में अपनी पत्नी की इज्जत नहीं बचा सका।"यह घटना दर्शाती है कि जब भीड़ तंत्र हावी होता है, तो वह राष्ट्र के रक्षकों और उनके बलिदानों को भी भूल जाता है।
उड़ीसा की घटना जो सितंबर 2024 में भुवनेश्वर के भरतपुर थाने में घटी थी अत्यंत विचलित करने वाली है, यह मामले इस बात के पुष्टि करते है कैसे एक अनुशासित सैनिक जब सिस्टम से मदद मांगने जाता है, तो उसे अपमान और हिंसा का सामना करना पड़ता है। एक समय सेना के अधिकारी को देश में सर्वोच्च सम्मान से देखा जाता था लेकिन उड़ीशा में मेजर और उनकी मंगेतर ब्रिगेडियर की बेटी के साथ पुलिसकर्मियों द्वारा थाने में हुई बर्बरता आज के समाज के नैतिक पतन की एक नई कहनी बंया करती है ।
उत्तराखंड के देहरादून के कलेमनटाउन में अक्टूबर 2024 में एक घटना जिसमे सूबेदार मेजर राम सिंह घर के पास की विवादित जमीन भू- माफिया द्वारा कब्जे का विरोध कर रहे थे, जिसकी शिकायत पुलिस प्रशासन से भी की थी लेकिन सिस्टम ने उनकी बात को गंभीरता से नहीं लिया। भू-माफिया जानते थे कि पुलिस की ढिलाई उनके पक्ष में है और घटना वाले दिन भू-माफिया के गुंडे और निर्माण करने वाले लोग का विरोध करने पर आरोपियों द्वारा उनके पर हमला करने की कोशिश व धक्का मुक्की की गई, भारी तनाव और धक्का-मुक्की के बीच, बुजुर्ग पूर्व सैनिक को हार्ट अटैक (दिल का दौरा) पड़ गया और मौके पर ही उनकी मृत्यु हो गई। देहरादून में ही के सन 2023 में राजपुर क्षेत्र में नेवी ऑफिसर की जमीन को लेकर हुई यह जालसाजी की घटना आपके द्वारा उठाए गए "जमीनी धोखाधड़ी" और "सिस्टम के भ्रष्टाचार" के मुद्दे का एक जीवंत और भयानक उदाहरण है। यह मामला मुख्य रूप से नेवी ऑफिसर स्वर्गीय लेफ्टिनेंट कमांडर निशांत सिंह (जो एक विमान हादसे में शहीद हो गए थे) और उनके परिवार की जमीन से जुड़ा है, जिसे भू-माफियाओं ने उनकी मृत्यु के बाद हड़पने की कोशिश की थी, मृतक अधिकारी की करोड़ो की जमीन को फर्जी दस्तावेज, और जाली वसीयत और नकली वारिस खड़ा करके हड़पने का प्रयास किया गया जिसमे कुछ कुख्यात प्रॉपटी डीलर और भू- माफिया रजिस्ट्रार ऑफिस और तहसील के कुछ कर्मचारी भी शामिल थे , पीड़ित परिवार को अपनी जमीन बचाने के लिए पुलिस और अदालतो के चक्कर काटने पड़े, जबकि शासन, प्रशासंन को स्वतः ही एक फौजी परिवार की सुरक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए थी ।
क्या हमारा समाज इतना कृतघ्न हो गया है? जो जवान माइनस डिग्री तापमान में खड़ा होकर हमारी नींद सुनिश्चित करता है, क्या हम उसकी जमीन और परिवार की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर सकते? अगर सेना का मनोबल इसी तरह टूटता रहा, तो इसका सीधा असर राष्ट्र की सुरक्षा पर पड़ेगा।
सरकार और प्रशासन को यह समझना होगा कि सैनिक केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि राष्ट्र के गौरव का प्रतीक है। उस पर हमला, देश के विश्वास पर हमला है। सरकार को ऐसे मामलों के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट और विशेष सुरक्षा कानून बनाने चाहिए। सैनिक की वर्दी पर हाथ डालने वाले को ऐसी सजा मिले जो नजीर बन जाए। केंद्र सरकार को संसद ,विधान सभा एवं नगर पालिका स्तर पर सैनिको के लिए प्रतिनिधि स्तर पर आरक्षण की व्यवस्था करनी चाहिए ।
दीपेन्द्र सिंह

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