आखिर वह दिन भी आ ही गया जब बड़कोट फारेस्ट रेंज के सीने पर चलने लगी आरी !


आखिर कब तक इंसानों के विकास की बलि चढ़ते रहेंगे हम।

एक पेड़ माँ के नाम, हजारों पेड़ कुर्बान अर्जी  विकास के नाम 

ऋषिकेश- देहरादून राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित बड़कोट वन क्षेत्र  का  लंबा  लगभग 8 -9 किलोंमीटर   लंबा यह हरित मार्ग  प्रकृति की अनुपम धरोहर का जीवंत उदाहरण है , इस मार्ग के दोनों ओर   करीब सेकड़ो वर्ष  से अधिक पुराने साल के  घने  , विशाल , छाया दार , गगनचुंबी वृक्ष अपनी लम्बी- लम्बी शाखाओं से मानो हर राहगीर के लिए हरित छत्र की चादर फैला कर खड़े हों,  इस  राजमार्ग से गुजरने वाले प्रत्येक यात्री को सूर्य की किरणों की तपिश से राहत, शीतल छाया शुद्ध वायु का     सुखद  एहसास  प्रदान करता था,  कई बार यहाँ पर  यात्रियों को इन वृक्षों  के नीचे यहाँ की सुंदरता को कैमरे में कैद करते हुए देखा जा सकता था ।
   लेकिन अब यह वृक्ष अब नहीं दिखेंगे दुबारा, क्योंकि अब यह वृक्ष अब  विकास की भेंट चढ़ने  वाले हैं अब  इस  राजमार्ग को चौड़ा करने हेतु तक़रीबन  3500 वृक्षों पर आरी चलने का समय आ चुका  है, उत्तराखंड में पिछले 12  वर्षो से मानो उत्तराखण्ड के खास तोर से यहाँ के जगलों को किसी की बुरी नजर लग गई है,  पिछले कुछ वर्षो में उत्तराखंड के जंगल बड़ी  तेजी से या तो विकास या फिर अतिक्रमण की भेंट  चढ़ चुके है  विकास के नाम पर जिस तरह से अंधाधुंध जंगलों  का कटान किया जा रहा है, यह काफी गंम्भीर प्रश्न खड़े करता है ।
  आखिर हमारे शासन की मंशा क्या है, क्या विकाश का अर्थ केवल पहाड़ो एवं जंगलो का सीना छलनी  कर के सड़को का चौड़ीकरण, पहाड़ो में गगनचुम्बी इमारतो, कंक्रीट के जंगल खड़े करना ही रह गया है या फिर प्राकृतिक  धरोहरों का सरक्षण हमारी  प्राथमिकताओं में  केवल बैनरो , शोशल मिडिया तक ही शामिल रह गया है ?    
उत्तराखंड  की पहचान सदियों से  उसकी निर्मल नदियों  और उसके घने वनो  से रही है, यदि यही जंगल लगातार  विकास, परियोजनाओं  और अतिक्रमण की भेंट चढ़ते रहे  तो आने वाले कुछ वर्षो में  जंगलों के अभाव में उत्तराखंड की पावन नदिया भी केवल बरसाती नाला बन कर रह जाएँगी जो  इन नदियों के से सटी  इमारतों के लिए सुलभ तौर  पर  सिर्फ नजरे बचा कर कूड़ा करकट फैकने  और सीवर का पानी  बहाने का जरिया बन कर रह जायेगी। 

क्योकि लगभग  सम्मूर्ण  उत्तराखण्ड इको सेंसेटिव जोन  की श्रेणी में आता है,  इको सेंसिटिव जोन का हवाला देकर ही   जीवन दायिनी मां गंगा नदी के सरंक्षण के लिए कई प्रस्तावित बांधो पर पुनर्विचार किया गया है, गंगा नदी की साहयक भागीरथी  नदी पर अंतिम चरण  पर बन रहे लोहरी नागपाल बांध को लगभग 500 करोड़  रुपए खर्च करने के बाद पूरी तरह से बंद कर दिया गया था तथा  कई अन्य जल विधुत परियोजना को भी रोका गया, क्या  उसी प्रकार से उत्तराखण्ड  के वनो को सुरक्षित रखने के लिए कोई मजूबत ठोस  नीति नहीं बनाई जा सकती है ? हमारी सरकारों को  ऐसे विकल्प खोजने होंगे कि  विकास की नाम पर शताब्दियों पुराने वृक्षों पर आरी चलाने  की नौबत ही न आये । 
   निष्कर्ष  यह है कि इको सेंसेटिव जोन  में जैव विवधता का आधार वन ही है, यही वन वन्यजीवों को प्राकृतिक आवास, भोजन , और सुरक्षित प्रजनन स्थल प्रदान करते है, साथ ही वन जल स्रोतों, मिट्टी और स्थानीय जलवायु का संतुलन बनाये रखते है , वनो का सरक्षण केवल पेड़ो की रक्षा करना ही नहीं बल्कि समूर्ण जैविक समुदाय एवं जैव विविधता  को सुरक्षित रखने का सबसे प्रभावी उपाय है । 
 
कुछ दिन और के मेहमान है हम वृक्ष
            कुछ दिन और के मेहमान है हम वृक्ष  
  थोड़े समय पश्चात हमे तस्वीरों में ही देख पाओगे
    आखिर हमने क्या बिगाड़ा था इंसानों का। 

                           


हम तो इंसानों को छाया ही प्रदान कर रहे थे हमसे क्या गलती हो गई।
हम तो इंसानों को छाया ही प्रदान कर रहे थे हमसे क्या गलती हो गई।
                    
हम तो इंसानों को छाया ही प्रदान कर रहे थे हमसे क्या गलती हो गई।
हम तो इंसानों को छाया ही प्रदान कर रहे थे हमसे क्या गलती हो गई।

     आखिर कब खत्म होगी इंसानों की यह भूख।                              
आखिर कब खत्म होगी इंसानों की यह भूख।
    आखिर कब खत्म होगी इंसानों की यह भूख।

उत्तराखंड के जंगलों पर आखिर लगी किसकी नजर ?
    उत्तराखंड के जंगलों पर आखिर लगी किसकी नजर ?         
आखिर कब खत्म होगी इंसानों की यह भूख।
       आखिर कब खत्म होगी इंसानों की यह भूख।


उत्तराखंड के जंगलों पर आखिर लगी किसकी नजर ?
उत्तराखंड के जंगलों पर आखिर लगी किसकी नजर ?    

    उत्तराखण्ड  के नेताओं ने ली है कसम , इसको                 बनाएगे  स्लम (SLAM  ) 

जब हम वन ही नहीं होंगे तो वन विभाग के नाम पर रोजगार पाने वाले और अतिक्रमण पर आंख मूंद कर बैठने वालों का क्या होगा
जब हम वन ही नहीं होंगे तो वन विभाग के नाम पर रोजगार पाने वालो का क्या !

जब वन ही  होंगे तब हम ऐसे बैनरो में ही  दिखाई देंगे,
    वनों  के बिना हम  हिरन, शेर  बैनरो/पोस्टरों  में ही            दिखाई देंगे ,  

                                      

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