विशेष रिपोर्ट: लोकतंत्र में सरकारें जन-कल्याण का दावा करती हैं, लेकिन उत्तराखंड में हाल ही में लिए गए कुछ फैसले एक अलग ही कहानी बयां कर रहे हैं। जहाँ एक तरफ राज्य के मंत्रियों का यात्रा भत्ता 300% बढ़ाकर ₹30 हजार कर दिया गया है, वहीं दूसरी तरफ प्रदेश के हजारों संविदा कर्मचारी आज भी अपनी मूलभूत मांगों के वर्षों से टकटकी लगाए बैठे हैं हैं। माननीय उच्चतम न्यायालय ने कई फैसलों में 'समान कार्य, समान वेतन' की व्यवस्था दी है। इसके बावजूद, उत्तराखंड के विभिन्न विभागों में कार्यरत संविदा कर्मी 20 हजार से 25 हजार रुपये के स्थिर वेतन पर काम करने को मजबूर हैं। मंत्रियों के भत्ते बढ़ाने में दिखाई गई 'रफ्तार' कर्मचारियों के मानदेय बढ़ाने के समय 'सुस्ती' में क्यों बदल जाती है?
आर्थिक आंकड़ों के अनुसार, वर्तमान में खुदरा महंगाई दर और रुपये की गिरती कीमत ने आम आदमी की कमर तोड़ दी है। जहाँ मंत्रियों को केवल यात्रा के लिए ₹90 हजार दिए जा रहे हैं, वहीं एक संविदा कर्मी को पूरे महीने की मेहनत के बदले उसका एक-तिहाई हिस्सा (₹20, हजार-25, हजार) भी समय पर नहीं मिलता। संविदा कर्मी सरकारी ड्यूटी के दौरान पूरी शिद्दत से निभाते हैं इसके बाद उनके पास दूसरा काम कार्य करने का ना तो समय बसता है और ना ही सामर्थ्य रहती है । दूर-दराज के क्षेत्रों से आए ये कर्मचारी शहरों में महंगे किराए के मकानों में रहते हैं। बिना समय पर वेतन मिले घर का राशन, बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं का खर्च उठाना इनके लिए एक 'जादुई करतब' जैसा हो गया है।
क्या सरकार के लिए मंत्रियों का भ्रमण, कर्मचारियों के भोजन से अधिक महत्वपूर्ण है? अगर सरकार का खजाना मंत्रियों के भत्ते बढ़ाने के लिए भरा है, तो कर्मचारियों के नियमितीकरण और वेतन वृद्धि के समय 'बजट का अभाव' क्यों बताया जाता है? क्या केवल घोषणाओं से उन परिवारों का पेट भरेगा जो पिछले कई वर्षों से नियमितीकरण की आस लगाए बैठे हैं?
बढ़ती महंगाई और आर्थिक अनिश्चितता के इस दौर में संविदा कर्मियों की सुध न लेना न केवल अन्यायपूर्ण है, बल्कि यह एक बड़े मानवीय संकट को जन्म दे रहा है। सरकार को चाहिए कि वह 'लोक-लुभावन' घोषणाओं से इतर, उन हाथों को मजबूत करे जो वास्तव में शासन की योजनाओं को धरातल पर उतारते हैं।

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