
विशेष रिपोर्ट: उत्तराखंड, जिसे हम 'देवभूमि' के नाम से जानते हैं, आज एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है जहाँ आधुनिकता और पर्यटन की चकाचौंध के पीछे असुरक्षा का अंधेरा गहराता जा रहा है। अंकिता भंडारी हत्याकांड मात्र एक आपराधिक घटना नहीं थी, बल्कि यह उत्तराखंड की कानून व्यवस्था, बेलगाम होते हॉस्पिटैलिटी सेक्टर का काला सच और महिला सुरक्षा के दावों की पोल खोलने वाला एक 'सिस्टमैटिक फेलियर' था। इस प्रकरण ने न केवल उत्तराखंड बल्कि पूरे देश की अंतरात्मा को झकझोर कर रख दिया था।
आधुनिकता की आड़ में पनपता 'सफेदपोश' अपराध ,पीड़िता उत्तराखंड की बेटी ने अपनी गरिमा और आत्मसम्मान की रक्षा के लिए प्राणों की आहुति दे दी, लेकिन इस प्रकरण ने राज्य के होटल, स्पा और वैलनेस सेंटरों की कड़वी सच्चाई उजागर कर दी है। दूर-दराज के गांवों से आने वाली लड़कियां जब शहरों में नाइट शिफ्ट और हॉस्पिटैलिटी सेक्टर में काम करने आती हैं, तो उन पर अक्सर अनैतिक कार्यों के लिए दबाव बनाया जाता है।
पिछले कुछ वर्षों में ऋषिकेश, हरिद्वार और नैनीताल जैसे पर्यटन क्षेत्रों में स्पा सेंटर की आड़ में चल रहे देह व्यापार के कई मामले पुलिस छापेमारी में सामने आए हैं। वंतरा रिजॉर्ट की पीड़िता उत्तराखंड की बेटी का केस यह सवाल खड़ा करता है कि कितनी और 'पीड़िता आज भी चुपचाप इस शोषण को सह रही होंगी।
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न आज भी हवा में तैर रहा है—"वह वीआईपी (VIP) कौन था?" पीड़िता के व्हाट्सएप चैट में जिस विशिष्ट अतिथि को 'एक्स्ट्रा सर्विस' देने का दबाव बनाया गया था, उसका नाम सार्वजनिक न होना जांच प्रणाली पर संदेह पैदा करता है। हालांकि मुख्य आरोपियों को सजा के दायरे में लाया गया है, लेकिन उस 'प्रभावशाली' व्यक्ति का बेनकाब न होना यह बताता है कि सत्ता के गलियारों में अपराधी आज भी संरक्षण पाते हैं। इस हत्याकांड के प्रकरण में धारा 354 (क) (354A) यौन उत्पीड़न और अनैतिक कार्यों के लिए दबाव बनाने की धाराएं लगाई गई थी जिसके नियमानुसार पीड़िता का नाम, उसका पता, उसके परिवार का विवरण या कोई भी ऐसी जानकारी जिससे उसकी पहचान हो सके, उसे सार्वजनिक नहीं किया जा सकता।इसके बावजूद, सोशल मीडिया और फोटो पॉलिटिक्स का खेल लगातार जारी है, जनप्रतिनिधियों द्वारा अपनी छवि चमकाने के लिए पीड़ित परिवार के साथ तस्वीरें साझा करना संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है।
सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार, यदि पीड़िता की मृत्यु हो चुकी है, तब भी उसके परिजनों की सहमति के बिना या किसी 'विशेष सार्वजनिक हित' के बिना नाम उजागर नहीं किया जा सकता। पीड़िता के मामले में, चूंकि उनका नाम पहले ही व्यापक रूप से मीडिया और आंदोलनों में आ चुका था, इसलिए सरकार इसे 'सम्मान' देने के तरीके के रूप में देख रही है। लेकिन तकनीकी रूप से, धारा 228A और सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस अभी भी कहती हैं कि पहचान गुप्त रहनी चाहिए ताकि परिवार को भविष्य में सामाजिक कलंक का सामना न करना पड़े। सरकार द्वारा नर्सिंग कॉलेज का नाम पीड़िता के नाम पर रखने का निर्णय एक ओर 'सम्मान' का प्रतीक लग सकता है, लेकिन दूसरी ओर यह कानूनी रूप से पहचान उजागर न करने के सिद्धांतों के विरुद्ध भी खड़ा है। क्या यह वास्तव में सम्मान है या फिर जनता के आक्रोश को शांत करने और 'पॉलिटिकल डैमेज कंट्रोल' की एक कोशिश उठाया गया कदम लगता है । क्या हमारी वर्तमान सरकार के प्रतिनिधि इन कानून की धाराओं और सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन से अनजान है?
हाल ही में हरिद्वार के एक पूर्व विधायक और उनकी कथित पत्नी (उर्मिला सनवाल) के बीच बातचीत का एक ऑडियो वायरल हुआ। जिसने जनता के जख्मों पर नमक छिड़कने का काम किया है। इसमें कथित तौर पर एक कद्दावर नेता और 'वीआईपी' के नाम का उल्लेख किया गया है, जो उत्तराखंड की बेटी के हत्याकांड के समय चर्चा में था। इस ऑडियो ने उत्तराखंड के लोगों के उन जख्मों को फिर से हरा कर दिया है जो सजा सुनाए जाने के बाद कुछ हद तक भर रहे थे। यह जनता के बीच इस धारणा को पुख्ता करता है कि मुख्य साजिशकर्ता अभी भी पर्दे के पीछे है। इस तरह की बयानबाजी दर्शाती है कि राजनीति में नैतिकता का स्तर कितना गिर चुका है, जहाँ एक बेटी की गरिमा और उसकी मौत को राजनीतिक उठापटक का मोहरा बना दिया जाता है। सरकार ने उत्तराखंड राज्य की पीड़िता के केस के बाद कई दिशा-निर्देश जारी किए, लेकिन क्या धरातल पर कुछ बदला है? वर्किंग हॉस्टल की कमी को क्या पूरा किया गया है ?कार्यस्थल पर आंतरिक शिकायत समिति का का किस स्तर पर गठन किया गया है ,पहाड़ों के सुनसान इलाकों में स्थित रिजॉर्ट्स में पुलिस पेट्रोलिंग की सुस्ती चुस्त दुरुस्त बनाने के लिए क्या उपाय किए गए हैं?
न्याय की बाट जोहता उत्तराखंड—अंकिता प्रकरण में सीबीआई जांच और रामपुर तिराहा का 'साया'*:
उत्तराखंड सरकार द्वारा अंकिता भंडारी हत्याकांड की जांच सीबीआई (CBI) को सौंपने की संस्तुति के बाद प्रदेश में एक बार फिर न्याय की उम्मीद जगी है। हालांकि, इस फैसले ने एक पुरानी बहस को भी जन्म दे दिया है—क्या सीबीआई जांच उस 'वीआईपी' (VIP) का नाम उजागर कर पाएगी जिसका जिक्र शुरुआती दिनों से हो रहा है? और सबसे बड़ा सवाल, क्या अंकिता को न्याय मिलने में भी रामपुर तिराहा कांड की तरह दशकों का समय लग जाएगा?
अंकिता प्रकरण में सबसे बड़ा पेंच उस कथित 'वीआईपी' गेस्ट का है, जिसे 'स्पेशल सर्विस' देने से इनकार करने पर अंकिता की हत्या का आरोप है। स्थानीय लोगों और परिजनों का मानना है कि अब तक की जांच में उस रसूखदार नाम को बचाने की कोशिश की गई है।
अब जब केंद्रीय एजेंसी इस मामले को संभालेगी, तो क्या वह उन कड़ियों को जोड़ पाएगी जिन्हें अब तक 'मिसिंग' माना जा रहा था? क्या सबूतों के साथ हुई कथित छेड़छाड़ के बावजूद सच सामने आ पाएगा? अंकिता मामले की तुलना अक्सर रामपुर तिराहा (मुजफ्फरनगर कांड) से की जाती है। 1994 में अलग राज्य की मांग कर रहे आंदोलनकारियों के साथ हुई दरिंदगी का मामला आज भी सीबीआई की अदालतों में खिंच रहा है। तीन दशक बीत जाने के बाद भी कई पीड़ित न्याय की आस लिए दुनिया से चले गए। रामपुर तिराहा कांड इस बात का गवाह है कि कैसे रसूखदार और तंत्र की मिलीभगत न्याय प्रक्रिया को दशकों तक अटका सकती है।
अंकिता मामले में सीबीआई जांच की घोषणा एक स्वागत योग्य कदम है, लेकिन चुनौतियां कम नहीं हैं, क्या सीबीआई एक समयबद्ध (Time-bound) जांच करेगी या यह भी तारीखों के जाल में उलझ जाएगा? घटना के तुरंत बाद रिजॉर्ट में हुई तोड़फोड़ से जो सबूत नष्ट हुए, क्या सीबीआई उनकी भरपाई कर पाएगी? क्या सिस्टम उस 'वीआईपी' के चेहरे से नकाब हटाने की अनुमति देगा?
अंकिता भंडारी सिर्फ एक बेटी नहीं, बल्कि उत्तराखंड के स्वाभिमान का प्रतीक बन चुकी है। राज्य की जनता अब केवल 'जांच' नहीं, बल्कि 'परिणाम' चाहती है। यदि इस मामले में भी रामपुर तिराहा जैसी देरी हुई, तो यह व्यवस्था पर से जनता के विश्वास को पूरी तरह उठा सकता है। आज पीड़िता का बलिदान हमें चेतावनी दे रहा है। यदि देवभूमि को 'अपराध भूमि' बनने से रोकना है, तो केवल प्रतीकात्मक फैसलों (जैसे नामकरण) से काम नहीं चलेगा। सरकार को 'वीआईपी संस्कृति' का अंत करना होगा और कार्यस्थलों पर महिलाओं के लिए एक ऐसा सुरक्षित वातावरण बनाना होगा जहाँ किसी और बेटी को अपनी अस्मत बचाने के लिए अपनी जान न गंवानी पड़े।
*क्या 'नाम' के बिना न्याय मुमकिन नहीं? अंकिता /उत्तराखंड की बेटी बनाम निर्भया — जन आंदोलन और निजता का द्वंद्व*
भारतीय न्याय व्यवस्था में 'निर्भया' एक ऐसा नाम बना जिसने देश का कानून बदल दिया। निर्भया (काल्पनिक नाम) की पहचान को कानून ने गुप्त रखा, फिर भी पूरा देश सड़कों पर था। आज उत्तराखंड में पीड़िता केस को लेकर यही बहस छिड़ी है कि क्या सरकार और राजनीतिक दल 'सम्मान' के नाम पर कानून की धज्जियां उड़ा रहे हैं? क्या जन आंदोलन खड़ा करने के लिए किसी बेटी की पहचान को सार्वजनिक करना संवैधानिक रूप से सही है?
निर्भया कांड: बिना नाम उजागर किए बदला 'सिस्टम', साल 2012 के निर्भया कांड ने साबित किया था कि आंदोलन के लिए 'चेहरे' की नहीं, **न्याय की तड़प'* की जरूरत होती है। उस समय मीडिया और प्रदर्शनकारियों ने पीड़िता को 'निर्भया' (निडर) नाम दिया। उनकी असली पहचान आज भी फाइलों में सुरक्षित है। जन आंदोलन उसे समय जन आंदोलन के असर से बिना पहचान सार्वजनिक किए, जनता ने सरकार को झुकने और 'वर्मा कमेटी' बनाने पर मजबूर किया, जिससे बलात्कार विरोधी कानून सख्त हुए। लेकिन इसके उलट पीड़िता (अ ) केस में पहचान उजागर करने की राजनीति साफ तौर से दिखाई दी ।
घटना के शुरुआती दिनों से ही पीड़िता का नाम और फोटो सोशल मीडिया से लेकर सड़कों पर लगे पोस्टरों तक में इस्तेमाल किया गया।
विशेषज्ञों का मानना है कि जब सरकारें या सत्ताधारी राजनीतिक दल दल किसी बड़े विवाद (जैसे VIP का नाम) से घिरते हैं, तो वे नामकरण या फोटो जैसे भावनात्मक कार्ड खेलकर जनता के आक्रोश की दिशा मोड़ देते हैं। इस केस में फोटो व नामांकरण करके राजनीतिक ढाल का इस्तेमाल किया गया अंकिता के नाम पर कॉलेज का नाम रखना एक ओर सम्मान है, लेकिन दूसरी ओर यह सुप्रीम कोर्ट के *'निपुण सक्सेना बनाम भारत संघ'* के उस आदेश का उल्लंघन है जो कहता है कि मृत्यु के बाद भी निजता का अधिकार समाप्त नहीं होता। यह धारणा गलत है कि बिना नाम के आंदोलन नहीं चल चल सकता उत्तराखंड की बेटी के केस में उत्तराखंड का जनमानस इसलिए सड़कों पर था क्योंकि पूरे उत्तराखंड की एक बेटी के साथ अन्याय हुआ था। 'वीआईपी' संस्कृति का अहंकार सामने आया था। पर्यटन की आड़ में चल रहे देह व्यापार के सिंडिकेट का पर्दाफाश हुआ था।
जनता पीड़िता /उत्तराखंड की बेटी के लिए न्याय मांग रही थी, न कि उसकी पहचान का प्रदर्शन। लेकिन राजनीतिक दलों और जनप्रतिनिधियों ने अपने सोशल मीडिया हैंडल्स पर पीड़िता के माता-पिता के साथ तस्वीरें साझा कर कानून की उस मंशा को चोट पहुँचाई जो भविष्य में पीड़िता के परिवार को सामाजिक सुरक्षा देती है। संविधान का *अनुच्छेद 21* (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) गरिमा के साथ जीने और मरने का अधिकार देता है। कानून (IPC 228A) स्पष्ट करता है कि किसी भी यौन अपराध पीड़िता की पहचान ''सार्वजनिक स्मृति' हिस्सा नहीं होनी चाहिए ताकि उसके परिवार को किसी सामाजिक कलंक का सामना न करना पड़े। पीड़िता /उत्तराखंड की बेटी के केस में जन आंदोलन स्वतः स्फूर्त था। इसे किसी नाम या चेहरे के सहारे की जरूरत नहीं थी। लेकिन जिस तरह से वर्तमान में 'वीआईपी' के नाम को दबाने के लिए भावनाओं का सहारा लिया जा रहा है, वह चिंताजनक है। असली श्रद्धांजलि कॉलेज का नाम बदलना नहीं, बल्कि उस 'वीआईपी' को बेनकाब करना और राज्य के हर रिजॉर्ट में काम करने वाली युवती को सुरक्षित महसूस कराना होगा।
(दीपेन्द्र सिंह कंडारी पूर्व सैनिक )
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