जमानत याचिका पर 23 सितंबर को सुनवाई की गई थी। बचाव व अभियोजन पक्ष की करीब ढाई घंटे की बहस सुनने के बाद जिला जज प्रदीप पंत ने फैसला सुरक्षित रख लिया था। जमानत याचिका पर बचाव पक्ष कीओर से सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ लूथरा, एवं श्री एस0 के0 धर अधिवक्ता देहरादून ,जबकि अभियोजन पक्ष की ओर से जिला शासकीय अधिवक्ता गुरु प्रसाद रतूड़ी ने अभियुक्त की जमानत के विरोध करते हुए विवेचक के द्वारा लिखित साक्ष्यों के पर आधार पर ठोस तर्क रखे थे।
अभियोजन की ओर से जिला शासकीय अधिवक्ता गुरु प्रसाद रतूड़ी जमानत के विरोध में अपने तर्कों में बताया की यह मामला आम आमजन की संपत्ति के फर्जीवाड़े से जुड़ा है जिनकी न्याय और न्यायपालिका पर गहरी निष्ठा है, इस प्रकरण में आरोपित कमल विरमानी व कुंवर पाल सिंह मुख्य अभियुक्त बनाए गए हैं अभियुक्त द्वारा अपनी 27 सालों के सिविल मामलों के अनुभव की जानकारी का गलत प्रयोग करते हुए फर्जी अभिलेखों की ड्राफ्टिंग की है, एवं न्यायालय के परिसर में अभियुक्त के मौजूद चेंबर के कंप्यूटर से उसके विरुद्ध कतिपय साक्ष्य भी प्राप्त है, और यदि अभियुक्त को जमानत हुई तो वह अपने सामाजिक रुतबे और प्रभाव का गलत इस्तेमाल कर साक्ष्य एवं साक्षियों से छेड़छाड़ कर व डरा धमका कर विवेचना में प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है, एवं रजिस्ट्री फर्जीवाड़े के मामले में अभी पूछताछ जारी है
दूसरी तरफ अभियुक्त की ओर से सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ लूथरा ने पैरवी करते हुए कहा था कि उनके मुवक्किल का नाम एफआईआर में नहीं है। उन्हें सह अभियुक्तों के बयान के आधार पर ही गिरफ्तार किया गया है। अभियुक्त पिछले 27 वर्षों से बतौर अधिवक्ता का व्यवसाय करता है , इसके अलावा भी उन्होंने अभियुक्त की ओर से जमानत याचना करते हुए अभियुक्त कमल विरमानी के पक्ष में तमाम तर्क रखे थे। इसके अलावा जमानत पत्र के समर्थन में अभियुक्त उसके चचेरे भाई परोपकार अतुल विरमानी द्वारा अपना शपथ पत्र प्रस्तुत करते हुए प्रस्तुत जमानत प्रार्थना पत्र को अभियुक्त की तरफ से इस न्यायालय में दिया गया प्रथम जमानत प्रार्थना पत्र होना बताया और इसके अतिरिक्त अभियुक्त कोई अन्य जमानत प्रार्थना पत्र किसी अन्य न्यायालय में लंबित नहीं है ।
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